इस कहर ने कितनो की हस्ती उजाड़ दी
एक पल में ही पूरी बस्ती उजाड़ दी
कल तक चमकते थे ख्वाब आँखों में
मलबों में ढेर इनकी हालत बिगाड़ दी
अब चुनता हूँ टुकड़े मलबों से तो
बन के दर्द यादें दस्तक देती है
आशियाने की खबर कहाँ अब
और तकलीफे ही पेट भर देती है
गुजर जाते है दिन अब यूँ ऐसे
की अश्क़ दामन भर देती है
हस्ती खेलती जिंदगी थी अपनी
अब एक बूत का असर देती है
गली के कोने में एक घर था अपना
हर शख्स था अपना और चाहत थी अपनी
अब लौटते भी है कभी उस ओर तो
खाली और सुनी सी डगर पाते है
कदम उठते है अब तो
दिल ये बस दहल जाते है
रास्तें तो कई है पर
आशियाने ना नजर आते है
पूछे किस खुदा से दर्द अपना
हर खुदा अब बेबस नजर आते है .....
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