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साज

किस साज पे नजम महकता है
किस साज पे नींदे उड़ती है
किस दर्द में फूल बिखरता है
किस बात पे कांटे चुभते है
हर धड़कन है उलझी हुयी
किस धड़कन पे तुम हम मिलते है
है वक़्त बैगाना सा लम्हा
जो दर्द समेटे बूँदों में
किस बूँद में है तेरी सूरत
किस बूँद में खाली सपने है
ये मोड़ है कैसा अश्क़ो का
सीने से जो गुजरता है
हर खालीपन की आहाट पे
तेरे नाम पे ठहरता है
एक बैचेनी है साँसों में
जो साँस के साज को तोड़े है
फिर भी तू महके साँसों में
जैसे आस आस को तोड़े है .....

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