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दर्द..

दो पन्नो की किस्मत में गम के पन्ने चार है
हर पन्नो पे दर्द एक मुकम्मल तलबगार है
आसमान ने छीन लिया एक हक़ मुझसे
और जमीन के एक रह गए हम गुनहगार है
.
उड़ते हुए पंछी से वास्ता क्या हमारा
टेढ़े रास्तो के भी हम एक कर्जदार है
छलनी है रूह एक अपनों के तीरो से
हर तीर के यहाँ कितने किस्सेदार है
.
अश्क़ो में डूबी धड़कने भी बेकार है
धड़कनो को बाटते फिर भी हिस्सेदार है
बच गयी चंद लम्हो की साँसे कुछ दरम्यान
जब साँसों से रूठी हर साँस हक़दार है .....

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